भारत में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की परीक्षाओं को देश की सबसे विश्वसनीय और महत्वपूर्ण परीक्षाओं में से एक माना जाता है। हर साल लाखों छात्र अपने भविष्य को संवारने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं। लेकिन हाल ही में सामने आए एक मामले ने इस पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। सीबीएसई कक्षा 12वीं के एक छात्र ने बोर्ड के पुनर्मूल्यांकन (री-इवैल्युएशन) की प्रक्रिया पर बेहद गंभीर और चौंकाने वाले आरोप लगाए हैं। छात्र का दावा है कि बोर्ड की वेबसाइट पर उसके रोल नंबर के तहत जो फिजिक्स (भौतिक विज्ञान) की उत्तर पुस्तिका अपलोड की गई है, वह उसकी है ही नहीं।
इस घटना के सामने आने के बाद इंटरनेट पर और देश के अभिभावकों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है। लोग सीबीएसई की नई तकनीकी मूल्यांकन प्रणाली, जिसे ‘ऑन-स्क्रीन मार्किंग’ (OSM) कहा जाता है, की विश्वसनीयता और सुरक्षा पर सवाल उठा रहे हैं। यह मामला केवल एक छात्र के अंकों का नहीं है, बल्कि यह देश के लाखों छात्र-छात्राओं के भविष्य और उनकी मानसिक शांति से जुड़ा हुआ है।
लिखावट के मिलान ने खोला गड़बड़ी का राज
पूरा मामला तब शुरू हुआ जब कक्षा 12वीं के इस छात्र के परीक्षा परिणाम घोषित हुए। छात्र को भौतिक विज्ञान (फिजिक्स) में उम्मीद से बेहद कम अंक मिले थे। छात्र को अपनी मेहनत पर पूरा भरोसा था, इसलिए उसने बिना समय गंवाए बोर्ड के नियमों के तहत अपनी जांची गई उत्तर पुस्तिकाओं की छायाप्रति (फोटोकॉपी) के लिए आवेदन किया। छात्र का मकसद सिर्फ यह देखना था कि उसकी गलतियां कहां हुईं ताकि वह पुनर्मूल्यांकन के लिए सही तरीके से दावा कर सके।
लेकिन जब छात्र ने इंटरनेट से अपनी भौतिक विज्ञान की उत्तर पुस्तिका डाउनलोड की, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। छात्र के शब्दों में, वह दृश्य उसके लिए “जीवन को झकझोर देने वाला” था। वेबसाइट पर अपलोड की गई कॉपी में जो लिखावट थी, वह उसकी अपनी लिखावट से बिल्कुल अलग थी। इतना ही नहीं, प्रश्नों के उत्तर देने का तरीका, शब्दों की बुनावट और वाक्यों का प्रवाह भी पूरी तरह से किसी अजनबी का था।
अपनी शंका को दूर करने के लिए छात्र ने उस उत्तर पुस्तिका का मिलान अपने अंग्रेजी और कंप्यूटर साइंस के पेपरों से किया—जिन दोनों कॉपियों में उसकी असली लिखावट मौजूद थी। उसने अपने स्कूल के नोट्स और साल भर की गई पढ़ाई के रजिस्टरों से भी उस कॉपी का मिलान किया। अंतर इतना साफ और बड़ा था कि उसे कोई भी सामान्य व्यक्ति पहली नजर में पहचान सकता था। अक्षरों की बनावट, दो शब्दों के बीच की दूरी, लिखने का झुकाव और यहां तक कि हाशिये छोड़ने का तरीका भी पूरी तरह बदला हुआ था। छात्र का साफ कहना है कि यह कॉपी उसकी है ही नहीं, बल्कि किसी दूसरे छात्र की कॉपी को उसके रोल नंबर के साथ जोड़ दिया गया है।
सीबीएसई की डिजिटल प्रणाली (OSM) के दावों की खुली पोल
इस गंभीर चूक के बाद सीबीएसई की उस नई डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली पर उंगलियां उठने लगी हैं, जिसे बोर्ड अपनी सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धि बताता रहा है। कुछ समय पहले ही सीबीएसई ने पारंपरिक रूप से कॉपियां जांचने के बजाय ‘ऑन-स्क्रीन मार्किंग’ (OSM) प्रणाली की शुरुआत की थी। इस व्यवस्था के तहत छात्रों की मुख्य कॉपियों को पहले स्कैन किया जाता है, फिर उन्हें डिजिटल रूप में कंप्यूटर पर परीक्षकों के पास भेजा जाता है, जहां वे स्क्रीन पर ही अंकों का निर्धारण करते हैं।
छात्र ने इस पूरी डिजिटल प्रक्रिया की बुनियादी सुरक्षा पर सीधे सवाल दागे हैं। छात्र ने पूछा है, “आखिर मेरे रोल नंबर के तहत किस कॉपी का मूल्यांकन किया गया? क्या मेरी असली कॉपी कभी जांची भी गई या वह किसी और के नाम पर दर्ज हो गई? और अगर यह कॉपी मेरी नहीं है, तो मेरी अपनी असली उत्तर पुस्तिका इस समय देश के किस कोने में है और किसके रोल नंबर पर चढ़ी हुई है?”
यह कोई इकलौता मामला नहीं है। इस साल देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्रों और अभिभावकों ने इस डिजिटल प्रणाली को लेकर कई तरह की शिकायतें दर्ज कराई हैं। कई छात्रों का कहना है कि उन्हें जो कॉपियां डाउनलोड करने को मिलीं, वे बेहद धुंधली थीं, कुछ कॉपियों के पन्ने गायब थे, तो कहीं-कहीं अंकों का जोड़ ही गलत था। तकनीक का उद्देश्य काम को आसान और पारदर्शी बनाना था, लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस नई व्यवस्था ने छात्रों की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है।
रातों की नींद और मन की शांति खो चुका है छात्र
एक मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चा जब 12वीं की बोर्ड परीक्षा की तैयारी करता है, तो वह केवल पढ़ाई नहीं करता, बल्कि अपनी पूरी सामाजिक जिंदगी को दांव पर लगा देता है। इस पीड़ित छात्र ने अपने बयान में उस गहरे मानसिक और भावनात्मक दर्द को बयां किया है जिससे वह इस समय गुजर रहा है।
छात्र ने भावुक होते हुए कहा, “बोर्ड परीक्षाओं में अच्छे अंक लाने के लिए मैंने अपनी नींद, अपने मन की शांति, दोस्तों के साथ घूमना-फिरना और अपनी हर खुशी कुर्बान कर दी थी। साल भर सिर्फ एक ही लक्ष्य था कि परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ करना है। लेकिन आज इस व्यवस्था ने मुझे इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है कि मुझे यह भी नहीं पता कि मेरी असली मेहनत की कमाई यानी मेरी मूल कॉपी कभी जांची भी गई या नहीं।”
अभिभावकों का कहना है कि परीक्षाओं का दबाव पहले ही बच्चों पर बहुत अधिक होता है। ऐसे में अगर परीक्षा देने के बाद भी बच्चों को इस बात का डर सताने लगे कि उनकी कॉपियों की अदला-बदली हो सकती है, तो वे किस भरोसे के साथ परीक्षा केंद्रों में बैठेंगे? यह सीधे तौर पर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
निष्पक्ष जांच और न्याय की गुहार
इस अभूतपूर्व संकट के सामने आने के बाद छात्र और उसके परिवार ने सीबीएसई प्रशासन से तुरंत हस्तक्षेप करने और इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है। छात्र ने बोर्ड के सामने मुख्य रूप से तीन बड़ी मांगें रखी हैं:
- मूल उत्तर पुस्तिका का भौतिक सत्यापन: बोर्ड डिजिटल फाइलों को छोड़कर, परीक्षा केंद्र से जमा हुई छात्र की असली कागजी उत्तर पुस्तिका को अपने रिकॉर्ड रूम से निकाले और उसकी लिखावट की जांच करे।
- स्कैनिंग और टैगिंग प्रक्रिया का ऑडिट: कंप्यूटर प्रणाली में कॉपियों को स्कैन करते समय और उन पर बारकोड या रोल नंबर डालते समय कहां और किस स्तर पर चूक हुई, इसकी पूरी तकनीकी जांच की जाए।
- अदला-बदली की साज़िश की जांच: यह पता लगाया जाए कि क्या यह केवल एक तकनीकी खराबी है या इसके पीछे कॉपियों को बदलने का कोई सोची-समझी धांधली का मामला है।
सोशल मीडिया पर फूटा आक्रोश, अदालत जाने की सलाह
जैसे ही इस छात्र की आपबीती इंटरनेट और सोशल मीडिया मंचों पर साझा की गई, देखते ही देखते यह खबर आग की तरह फैल गई। हजारों की संख्या में छात्रों, शिक्षकों और शिक्षाविदों ने इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रियाएं दी हैं। देश भर के लोग छात्र के समर्थन में खड़े हो गए हैं और सीबीएसई के ढीले रवैये की कड़ी आलोचना कर रहे हैं।
सोशल मीडिया पर आम लोगों ने छात्र को कानूनी रास्ता अपनाने की सलाह दी है। कई कानूनविदों और जागरूक नागरिकों ने कहा है कि छात्र को बिना समय गंवाए सीधे दिल्ली उच्च न्यायालय या अपने संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में याचिका दायर करनी चाहिए, क्योंकि शिक्षा का अधिकार और निष्पक्ष मूल्यांकन का अधिकार हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। लोगों ने छात्र को स्कूल के प्रधानाचार्य के माध्यम से सीबीएसई के क्षेत्रीय कार्यालय में लिखित शिकायत दर्ज कराने और मामले को व्यक्तिगत रूप से उठाने के लिए भी कहा है।
इंटरनेट पर लोगों का गुस्सा इस बात को लेकर है कि सीबीएसई जैसी प्रतिष्ठित संस्था इतनी बड़ी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा को हल्के में कैसे ले सकती है। एक यूजर ने लिखा, “यह केवल एक छात्र की कहानी नहीं है, यह उस हर बच्चे की कहानी है जो व्यवस्था के दोष के कारण पीछे छूट जाता है। सीबीएसई बच्चों की जिंदगी के साथ लॉटरी नहीं खेल सकता।”
व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही की सख्त जरूरत
यह पूरा विवाद इस बात का स्पष्ट संकेत है कि शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे डिजिटल सुधारों को अभी और अधिक सुधार और पारदर्शिता की आवश्यकता है। जब तक ऑनलाइन मूल्यांकन प्रणाली पूरी तरह से दोषमुक्त और सुरक्षित नहीं हो जाती, तब तक उसे इस तरह लागू करना आत्मघाती साबित हो सकता है।
शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि सीबीएसई को इस मामले को एक चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। यदि देश की सबसे बड़ी परीक्षा संस्था अपनी साख बचाना चाहती है, तो उसे इस पीड़ित छात्र को तुरंत न्याय देना होगा। कॉपियों की स्कैनिंग, बारकोडिंग और रोल नंबर के मिलान की पूरी प्रक्रिया को इतना पारदर्शी बनाना होगा कि भविष्य में किसी भी बच्चे को अपनी ही लिखी हुई बात को साबित करने के लिए दर-दर की ठोकरें न खानी पड़ें। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक छात्रों का इस परीक्षा प्रणाली से भरोसा उठता रहेगा, जो किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए एक शुभ संकेत नहीं है।