मदुरै, तमिलनाडु का एक साधारण-सा घर।
न टेलीविजन, न कार… यहां तक कि पहला टेलीफोन भी तब आया जब सुंदर किशोर थे।

लेकिन एक चीज़ थी — सपना
और वो सपना था कुछ बड़ा करने का

शुरुआत – ज़मीन से जुड़े सपने

सुंदर पिचाई के पिता एक सामान्य इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे, जिनकी सैलरी मुश्किल से परिवार का खर्च चला पाती थी। लेकिन उन्होंने कभी अपने बेटे की पढ़ाई में कमी नहीं आने दी।

सुंदर ने IIT खड़गपुर से मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग की। वो वहां से निकलते हुए सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि संघर्ष की समझ और संभावनाओं की चाबी लेकर निकले।


अमेरिका की उड़ान – एक सैलरी, एक सपना

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिला। लेकिन टिकट के पैसे?
उनके पिता ने अपनी पूरी साल की कमाई देकर सुंदर को अमेरिका भेजा।
नया देश, नया कल्चर, और जेब में सीमित पैसे — लेकिन हौसला असीम।


गूगल में कदम – कोडिंग से क्रांति तक

2004 में सुंदर ने Google जॉइन किया।
शुरुआत में उन्होंने Google Toolbar और फिर दुनिया का सबसे इस्तेमाल किया जाने वाला ब्राउज़र — Google Chrome बनाया।

उनका शांत व्यवहार, टीम भावना और टेक्नोलॉजी के लिए जुनून, सबने उन्हें सबसे अलग बना दिया।


CEO की कुर्सी तक का सफर

2015 में उन्हें Google का CEO बनाया गया।
2019 में वो बने Alphabet Inc. (गूगल की पैरेंट कंपनी) के भी CEO।

आज, एक आम भारतीय छात्र दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनी का नेतृत्व कर रहा है।


इस कहानी से क्या सीखें?

✅ बड़े सपने छोटे शहरों से भी निकल सकते हैं।
✅ सीमित संसाधन, असीम हौसले को रोक नहीं सकते।
✅ मेहनत, धैर्य और लगन — यही असली हथियार हैं।