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डीपमाइंड से नोबेल तक: डेमिस हसाबिस की वह कहानी, जहां खेलों ने विज्ञान को नई आंख दे दी

लेखक: Stalin • May 27, 2026 • 11 मिनट पढ़ें
डीपमाइंड से नोबेल तक: डेमिस हसाबिस की वह कहानी, जहां खेलों ने विज्ञान को नई आंख दे दी
Demis Hassabis’s journey from a chess-loving child to the founder of DeepMind and a Nobel Prize winner reflects how curiosity, science and artificial intelligence came together to change the world.
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शतरंज की बिसात से शुरू हुई एक ऐसी यात्रा, जिसने कृत्रिम बुद्धिमत्ता को प्रयोगशाला से उठाकर जीवन की गुत्थियों तक पहुंचा दिया

लंदन की एक शांत सुबह थी। एक छोटा बच्चा शतरंज की बिसात के सामने बैठा था। उसके सामने काले और सफेद मोहरे थे, लेकिन उसकी आंखों में वे सिर्फ मोहरे नहीं थे। वे रास्ते थे, संकेत थे, भविष्य की छिपी हुई चालें थीं। वह बच्चा हर चाल से पहले रुकता था, सोचता था और फिर अपने छोटे से हाथ से मोहरा आगे बढ़ाता था।

उस बच्चे का नाम था डेमिस हसाबिस

डेमिस हसाबिस का जन्म 27 जुलाई 1976 को लंदन में हुआ। उनके पिता यूनानी साइप्रस मूल के थे और मां सिंगापुर से थीं, जिनकी जड़ें चीनी परिवार से जुड़ी थीं। उनके घर में अलग-अलग संस्कृतियों की छाया थी। शायद इसी वजह से उनका मन बचपन से ही किसी एक सीमा में बंद होकर नहीं सोचता था।

डेमिस बहुत छोटी उम्र से ही चीजों को अलग ढंग से देखने लगे थे। जहां दूसरे बच्चे खेल को सिर्फ खेल समझते थे, वहीं डेमिस खेलों के भीतर छिपे नियम, संभावना और बुद्धि को खोजते थे। चार साल की उम्र में उन्होंने शतरंज खेलना शुरू किया। धीरे-धीरे शतरंज उनके लिए मनोरंजन नहीं रहा। वह उनके मन का पहला विद्यालय बन गया।

शतरंज ने उन्हें धैर्य सिखाया। उसने उन्हें बताया कि जल्दबाजी हमेशा बुद्धिमानी नहीं होती। कभी-कभी सबसे मजबूत चाल वह होती है जो अभी दिखाई नहीं देती, लेकिन कुछ चालों बाद पूरी बिसात बदल देती है। डेमिस ने बचपन में ही यह समझ लिया था कि बुद्धि सिर्फ तेज दिमाग का नाम नहीं है। बुद्धि का अर्थ है आगे देखना, गलती से सीखना और सही समय पर सही निर्णय लेना।

किशोर उम्र तक पहुंचते-पहुंचते डेमिस शतरंज के बहुत मजबूत खिलाड़ी बन चुके थे। वे इंग्लैंड की कनिष्ठ शतरंज टीम से जुड़े। प्रतियोगिताओं में उन्होंने नाम कमाया। इसी शतरंज से जीते पैसों से उन्होंने अपना पहला संगणक खरीदा। यह मशीन उनके जीवन में एक नए दरवाजे की तरह आई।

दूसरों के लिए संगणक सिर्फ एक यंत्र था, लेकिन डेमिस के लिए यह कल्पना का नया मैदान था। उन्होंने स्वयं कार्यक्रम लिखना सीखा। किताबें पढ़ीं, प्रयोग किए, गलतियां कीं और फिर उन्हें ठीक किया। धीरे-धीरे उनके भीतर एक बड़ा सवाल जन्म लेने लगा।

क्या कोई मशीन भी सीख सकती है?

क्या कोई यंत्र केवल आदेश मानने के बजाय अनुभव से समझ बना सकता है?

क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता मनुष्य की तरह गलतियों से आगे बढ़ सकती है?

यही सवाल आगे चलकर उनके जीवन का केंद्र बन गया।

युवा होने पर डेमिस खेलों की दुनिया में उतर गए। उन्होंने कई चर्चित संगणक खेलों के निर्माण में काम किया। इन खेलों ने उन्हें सिखाया कि एक खेल सिर्फ रंग, ध्वनि और आनंद का मिश्रण नहीं होता। खेल एक व्यवस्था होता है। उसमें नियम होते हैं, निर्णय होते हैं, परिणाम होते हैं और हर निर्णय एक नई स्थिति पैदा करता है।

डेमिस के लिए खेल प्रयोगशाला बन गए थे। वे खेलों के माध्यम से समझ रहे थे कि सीखना कैसे होता है, रणनीति कैसे बनती है और बुद्धि किस तरह बदलती परिस्थिति के साथ खुद को ढालती है।

लेकिन वे यहां रुकने वाले नहीं थे। उनके भीतर एक और गहरी बेचैनी थी। वे मनुष्य के मस्तिष्क को समझना चाहते थे। इसलिए उन्होंने आगे चलकर स्मृति और कल्पना पर शोध किया। वे जानना चाहते थे कि मनुष्य पुराने अनुभवों से भविष्य की तस्वीर कैसे बनाता है। जब हम किसी आने वाली घटना की कल्पना करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क अतीत के टुकड़ों को जोड़कर नया दृश्य बनाता है। यही क्षमता मनुष्य को लचीला और रचनात्मक बनाती है।

डेमिस चाहते थे कि मशीनें भी कुछ ऐसा ही सीखें। वे ऐसी मशीनें बनाना चाहते थे जो केवल लिखे हुए आदेशों पर न चलें, बल्कि अनुभव से सीखें, नई परिस्थिति को समझें और नए रास्ते खोजें।

फिर आया वर्ष 2010।

डेमिस हसाबिस ने शेन लेग और मुस्तफा सुलेमान के साथ मिलकर लंदन में डीपमाइंड की स्थापना की। यह कोई साधारण तकनीकी कंपनी नहीं थी। इसका सपना बहुत बड़ा था। उनका विचार था कि पहले बुद्धि को समझा जाए, फिर उसी बुद्धि की सहायता से दुनिया की कठिन समस्याओं को हल किया जाए।

डीपमाइंड ने शुरुआत खेलों से की। पुराने संगणक खेलों में मशीन को रखा गया। उसे विस्तार से नियम नहीं समझाए गए। उसे बस चित्रपट दिखाई गया। उसे कोशिश करनी थी, हारना था, फिर सीखना था और फिर बेहतर बनना था।

यह दृश्य किसी बच्चे जैसा था जो पहली बार कोई खेल खेलता है। पहले वह हारता है, फिर पैटर्न पकड़ता है, फिर चाल समझता है और धीरे-धीरे मजबूत खिलाड़ी बन जाता है।

यही डीपमाइंड की असली ताकत थी। डेमिस मशीन को सिर्फ चलाना नहीं चाहते थे। वे मशीन को सीखना सिखाना चाहते थे।

धीरे-धीरे दुनिया की बड़ी कंपनियों की नजर डीपमाइंड पर पड़ने लगी। फेसबुक भी रुचि दिखा रहा था और गूगल भी। उस समय डीपमाइंड को बड़े संसाधनों की जरूरत थी। उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर काम करने के लिए बहुत अधिक गणना शक्ति, शोधकर्ताओं की मजबूत टोली और लंबे समय तक धैर्यपूर्वक निवेश की आवश्यकता थी।

डेमिस ने गूगल को चुना।

इस निर्णय के पीछे सिर्फ धन नहीं था। गूगल के पास विशाल गणना शक्ति थी, मजबूत शोध संस्कृति थी और ऐसे बड़े सपनों को समय देने की क्षमता थी। डेमिस यह भी समझते थे कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता बहुत शक्तिशाली हो सकती है। इसलिए उसके उपयोग में नैतिकता और सावधानी जरूरी है। वे चाहते थे कि इस तकनीक का विकास केवल लाभ कमाने के लिए न हो, बल्कि मानवता के हित को ध्यान में रखकर हो।

2014 में गूगल ने डीपमाइंड को अपने साथ जोड़ लिया। अब डेमिस और उनकी टोली के पास वह शक्ति थी, जिसकी उन्हें अपने बड़े सपने के लिए जरूरत थी।

फिर दुनिया ने डीपमाइंड की असली ताकत देखी।

यह कहानी जुड़ी थी एक प्राचीन खेल गो से।

गो देखने में सरल लगता है, लेकिन यह संसार के सबसे कठिन खेलों में से एक है। इसका पट बड़ा होता है और संभावनाएं इतनी अधिक होती हैं कि केवल गणना से जीतना आसान नहीं। इसमें अंतर्ज्ञान, संतुलन, धैर्य और गहरी समझ की जरूरत होती है। बहुत से विशेषज्ञ मानते थे कि सर्वश्रेष्ठ मनुष्य खिलाड़ियों को हराने में मशीनों को अभी बहुत समय लगेगा।

डीपमाइंड ने इस चुनौती को स्वीकार किया।

उन्होंने बनाया अल्फागो

पहले अल्फागो ने यूरोप के एक बड़े गो खिलाड़ी को हराया। यह महत्वपूर्ण घटना थी। लेकिन असली परीक्षा 2016 में हुई, जब अल्फागो का सामना दक्षिण कोरिया के महान खिलाड़ी ली सेडोल से हुआ। ली सेडोल गो के इतिहास के सबसे बड़े नामों में गिने जाते थे। पूरी दुनिया इस मुकाबले को देख रही थी।

यह केवल खेल नहीं था। यह मनुष्य की पुरानी बुद्धि और मशीन की नई बुद्धि के बीच एक ऐतिहासिक मुलाकात थी।

पहली बाजी में अल्फागो ने जीत दर्ज की। लोग चौंक गए। फिर दूसरी बाजी आई। इसी बाजी में अल्फागो ने एक ऐसी चाल चली, जिसे आज भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इतिहास में याद किया जाता है।

वह चाल बहुत अजीब लगी। अनुभवी खिलाड़ियों को समझ नहीं आया कि मशीन ने ऐसा क्यों किया। कुछ लोगों ने सोचा कि यह गलती है। लेकिन धीरे-धीरे साफ हुआ कि यह गलती नहीं थी। अल्फागो ने खेल को मनुष्यों की आदतों से बाहर जाकर देखा था। उसने केवल पुराने खेलों की नकल नहीं की थी। उसने अपनी नई सोच दिखाई थी।

उस क्षण दुनिया ने समझा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तेज गणना नहीं है। वह नए रास्ते भी खोज सकती है। वह मनुष्य को चौंका सकती है। वह ऐसी संभावना दिखा सकती है, जिसे मनुष्य ने अपनी आदतों के कारण नजरअंदाज कर दिया था।

अल्फागो ने ली सेडोल को पांच बाजियों के मुकाबले में चार एक से हराया। ली सेडोल ने एक बाजी जीती और वह जीत मानव जिजीविषा की सुंदर चमक की तरह याद की जाती है। लेकिन कुल परिणाम ने दुनिया को बता दिया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है।

डेमिस हसाबिस के लिए यह बहुत बड़ा क्षण था, लेकिन यह अंतिम लक्ष्य नहीं था। उनके लिए खेल हमेशा अभ्यास का मैदान थे। उनका असली सपना था कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता विज्ञान की कठिन समस्याओं को हल करने में मदद करे।

यहीं से कहानी मुड़ती है जीवन की गहराई की ओर।

जीव विज्ञान में एक बहुत पुरानी समस्या थी। यह समस्या प्रोटीन की संरचना से जुड़ी थी। प्रोटीन हमारे शरीर की छोटी-छोटी मशीनों की तरह काम करते हैं। उनका आकार तय करता है कि वे शरीर में क्या काम करेंगे। यदि किसी प्रोटीन की बनावट समझ में आ जाए, तो बीमारी को समझना, दवा बनाना और जीवन की प्रक्रियाओं को पढ़ना आसान हो सकता है।

लेकिन प्रोटीन कैसे मुड़ता है और उसका तीन आयामी आकार कैसा बनता है, यह जानना बहुत कठिन काम था। वैज्ञानिक इस समस्या पर दशकों से काम कर रहे थे। कई बार किसी एक प्रोटीन की संरचना समझने में महीनों या वर्षों का समय लग जाता था।

डीपमाइंड ने इसी कठिन समस्या पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता की रोशनी डाली।

उन्होंने बनाया अल्फाफोल्ड

अल्फाफोल्ड ने प्रोटीन संरचनाओं का अनुमान लगाने में अद्भुत सफलता दिखाई। यह सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं थी। यह विज्ञान के अंधेरे कमरे में खिड़की खुलने जैसा था। अब शोधकर्ताओं को शुरुआत के लिए एक मजबूत अनुमान मिल सकता था। वे बीमारी, औषधि, एंजाइम और जीवन की मूल प्रक्रियाओं पर तेजी से काम कर सकते थे।

अल्फाफोल्ड ने यह साबित किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल खेल जीतने या चित्र पहचानने की चीज नहीं है। वह विज्ञान की भाषा पढ़ने में भी मदद कर सकती है। वह जीवन की उन तहों को खोल सकती है, जिन्हें समझने में मनुष्य को बहुत समय लग रहा था।

फिर 2024 में डेमिस हसाबिस के जीवन का सबसे बड़ा सार्वजनिक सम्मान आया।

उन्हें जॉन जम्पर के साथ रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला। यह सम्मान उन्हें प्रोटीन संरचना की भविष्यवाणी में अल्फाफोल्ड के योगदान के लिए दिया गया। इसी पुरस्कार का दूसरा हिस्सा डेविड बेकर को प्रोटीन अभिकल्पना के लिए मिला।

यह नोबेल केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं थी। यह इस बात की स्वीकृति थी कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब विज्ञान की बाहरी चीज नहीं रही। वह विज्ञान के केंद्र में प्रवेश कर चुकी है।

डेमिस की यात्रा को अगर ध्यान से देखें तो उसमें एक सुंदर क्रम दिखाई देता है।

शतरंज ने उन्हें आगे सोचना सिखाया।
संगणक खेलों ने उन्हें व्यवस्था बनाना सिखाया।
मस्तिष्क विज्ञान ने उन्हें स्मृति और कल्पना को समझना सिखाया।
डीपमाइंड ने उन्हें बुद्धि पर प्रयोग करने का मंच दिया।
अल्फागो ने दुनिया को दिखाया कि मशीन नई शैली बना सकती है।
अल्फाफोल्ड ने दिखाया कि मशीन विज्ञान की बंद किताब खोल सकती है।
नोबेल पुरस्कार ने दिखाया कि दुनिया ने इस योगदान को समझ लिया है।

डेमिस हसाबिस की कहानी में इलॉन मस्क का नाम भी आता है। मस्क लंबे समय से शक्तिशाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर चिंता जताते रहे हैं। बताया जाता है कि उन्होंने डीपमाइंड में रुचि इसलिए भी ली थी क्योंकि वे समझना चाहते थे कि यह तकनीक किस दिशा में जा रही है।

एक चर्चित प्रसंग में मस्क और डेमिस के बीच मंगल ग्रह पर मानव बस्ती को लेकर बातचीत हुई। मस्क मानते थे कि मनुष्य को भविष्य की सुरक्षा के लिए पृथ्वी से बाहर भी बसना चाहिए। डेमिस ने इस विचार पर गंभीर सवाल रखा। उनका संकेत था कि यदि खतरा नियंत्रण से बाहर जाती कृत्रिम बुद्धिमत्ता से हुआ, तो केवल मंगल पर जाना भी सुरक्षा की पूर्ण गारंटी नहीं होगा, क्योंकि तकनीक संचार माध्यमों से बहुत दूर तक पहुंच सकती है।

यह प्रसंग डेमिस के व्यक्तित्व का एक और पक्ष दिखाता है। वे केवल शक्तिशाली तकनीक बनाने वाले वैज्ञानिक नहीं हैं। वे उसके परिणामों को लेकर भी सोचते हैं। उनके भीतर जिज्ञासा है, लेकिन लापरवाही नहीं। वे जानते हैं कि बुद्धि शक्ति है और शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी आती है।

आज डेमिस हसाबिस का नाम केवल डीपमाइंड या नोबेल तक सीमित नहीं है। वे उस विचार के प्रतीक बन चुके हैं जिसमें मशीनों को मनुष्य का स्थान लेने के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य की समझ को बढ़ाने के लिए देखा जाता है।

फिर भी उनकी कहानी चेतावनी भी देती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता दवा खोजने में मदद कर सकती है, लेकिन गलत हाथों में भ्रम भी फैला सकती है। वह विज्ञान को तेज कर सकती है, लेकिन शक्ति को कुछ कंपनियों तक सीमित भी कर सकती है। वह मानवता को आगे ले जा सकती है, लेकिन तभी जब उसके विकास में सावधानी, नैतिकता और मानवीय दृष्टि बनी रहे।

डेमिस हसाबिस की कहानी इसलिए खास है क्योंकि वह केवल सफलता की कहानी नहीं है। यह एक सवाल की कहानी है। वह सवाल जो एक बच्चे ने शतरंज की बिसात पर बैठकर शायद पहली बार महसूस किया था।

अगली चाल क्या होगी?

आज वही बच्चा बड़ा होकर मानवता को विज्ञान की अगली चाल दिखाने वालों में शामिल है।

एक समय वह काले और सफेद मोहरों के बीच छिपे रास्ते खोज रहा था। आज उसकी बनाई तकनीक जीवन के भीतर छिपी संरचनाओं को समझने में दुनिया की मदद कर रही है।

यही डेमिस हसाबिस की कहानी है।

शतरंज से डीपमाइंड तक।
डीपमाइंड से अल्फागो तक।
अल्फागो से अल्फाफोल्ड तक।
और अल्फाफोल्ड से नोबेल पुरस्कार तक।

कभी-कभी सबसे बड़ी क्रांति शोर से शुरू नहीं होती। वह चुपचाप शुरू होती है। एक बच्चे से, एक बिसात से और एक ऐसे सवाल से, जो वर्षों बाद पूरी दुनिया की सोच बदल देता है।

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यह लेख केवल जानकारी, शिक्षा और संपादकीय उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों, आधिकारिक विवरणों और विश्वसनीय संदर्भों के आधार पर तैयार की गई है। तथ्यों को यथासंभव सही रखने का प्रयास किया गया है, फिर भी पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी महत्वपूर्ण जानकारी की पुष्टि आधिकारिक और विश्वसनीय स्रोतों से अवश्य करें।

इस लेख में उपयोग की गई तस्वीरें कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से बनाई गई हैं। ये तस्वीरें वास्तविक घटना, वास्तविक समारोह या किसी आधिकारिक क्षण की असली तस्वीरें नहीं हैं। इनका उद्देश्य केवल लेख की कहानी और विषय को प्रतीकात्मक रूप से समझाना है।

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