मेटा विवरण: डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को 26 मई 2026 को 30 दिन की पैरोल मिली। जानिए उनका पूरा आपराधिक इतिहास, साध्वी यौन शोषण मामला, पत्रकार रामचंद्र छत्रपति प्रकरण, रणजीत सिंह केस, लंबित आरोप और बार-बार पैरोल पर उठते सवाल।
जमानत नहीं, पैरोल मिली है
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह एक बार फिर रोहतक की सुनारिया जेल से बाहर आ गया है। 26 मई 2026 को हरियाणा सरकार ने उसे 30 दिन की पैरोल दी है और रिपोर्टों के अनुसार उसे 24 जून 2026 तक वापस जेल लौटना होगा। यह बात सबसे पहले साफ करना जरूरी है कि यह “जमानत” नहीं, बल्कि “पैरोल” है। जमानत मुकदमे की सुनवाई या अपील के दौरान अदालत से मिलने वाली राहत हो सकती है, जबकि पैरोल सजा काट रहे कैदी को तय शर्तों पर अस्थायी रिहाई होती है।
राम रहीम का नाम केवल एक धार्मिक डेरे के प्रमुख के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय आपराधिक न्याय-व्यवस्था के सबसे चर्चित मामलों में से एक के रूप में दर्ज है। वह 2017 से साध्वियों के यौन शोषण मामले में 20 साल की सजा काट रहा है। इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों में उसे बार-बार पैरोल और फर्लो मिलती रही है, जिस पर राजनीतिक, सामाजिक और न्यायिक बहस लगातार उठती रही है।
कौन है गुरमीत राम रहीम
गुरमीत राम रहीम सिंह डेरा सच्चा सौदा का प्रमुख है। डेरा सच्चा सौदा का आधार हरियाणा के सिरसा में है और इसका प्रभाव हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक माना जाता है। राम रहीम ने खुद को धार्मिक गुरु, समाज सुधारक, गायक, अभिनेता और फिल्म निर्माता के रूप में पेश किया। उसके समर्थकों की बड़ी संख्या ने उसे एक प्रभावशाली धार्मिक चेहरा बना दिया, लेकिन इसी चमकदार आवरण के पीछे गंभीर आपराधिक आरोपों की लंबी परछाईं खड़ी थी।
डेरा के भीतर अनुशासन, आस्था और सत्ता का ऐसा मिश्रण बना जिसमें अनुयायियों की आवाज अक्सर दब जाती थी। यही कारण था कि जब साध्वियों के यौन शोषण का मामला सामने आया, तो वह केवल एक अपराध की कहानी नहीं रही; वह धर्म, भय, सत्ता और चुप्पी के गठजोड़ की कहानी बन गई।
साध्वी यौन शोषण मामला कैसे शुरू हुआ
राम रहीम के खिलाफ सबसे बड़ा मामला दो साध्वियों के यौन शोषण से जुड़ा था। इस प्रकरण की शुरुआत 2002 में एक गुमनाम पत्र से हुई। पत्र तत्कालीन प्रधानमंत्री, उच्च न्यायालय और अन्य अधिकारियों तक पहुंचा। उसमें डेरा के भीतर साध्वियों के यौन शोषण का आरोप लगाया गया था। बाद में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने जांच शुरू की।
लंबी जांच और मुकदमे के बाद 25 अगस्त 2017 को पंचकूला की विशेष अदालत ने राम रहीम को दोषी ठहराया। 28 अगस्त 2017 को उसे दो साध्वियों से बलात्कार के मामले में कुल 20 साल की सजा सुनाई गई। यह सजा 10-10 साल की दो अलग-अलग सजाओं के रूप में दी गई, जिन्हें क्रम से काटना था।
फैसले के दिन पंचकूला और आसपास के इलाकों में हिंसा भड़क उठी। डेरा समर्थकों और पुलिस के बीच टकराव हुआ, कई लोगों की मौत हुई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। उस दिन यह साफ हो गया कि यह मामला केवल एक अदालत के फैसले तक सीमित नहीं था; इसके पीछे अंधभक्ति, भीड़-शक्ति और राजनीतिक भय का पूरा संसार खड़ा था।
पत्रकार रामचंद्र छत्रपति का मामला
राम रहीम की कहानी में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति का नाम बहुत महत्वपूर्ण है। छत्रपति ने अपने अखबार में डेरा से जुड़े गंभीर आरोपों को छापा था। 2002 में उनकी हत्या कर दी गई। बाद में इस मामले में राम रहीम और अन्य आरोपियों पर मुकदमा चला। 2019 में विशेष अदालत ने राम रहीम को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
लेकिन मार्च 2026 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने इस मामले में राम रहीम को बरी कर दिया। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए कहा कि साजिश के आरोपों और कुछ गवाहियों को लेकर गंभीर कमियां थीं। हालांकि इसी मामले में कुछ अन्य आरोपियों की सजा बरकरार रखी गई। छत्रपति परिवार ने इस फैसले को आगे चुनौती देने की बात कही है।
यहां एक बात समझनी होगी: बरी होना और आरोपों का इतिहास मिट जाना अलग-अलग चीजें हैं। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला दिया, लेकिन पत्रकार की हत्या का यह प्रकरण आज भी भारतीय पत्रकारिता की उन सबसे दर्दनाक कहानियों में गिना जाता है, जहां सच लिखने की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी।
रणजीत सिंह हत्या मामला
डेरा के पूर्व प्रबंधक रणजीत सिंह की हत्या भी 2002 में हुई थी। आरोप था कि रणजीत सिंह को उस गुमनाम पत्र के प्रसार से जोड़कर देखा गया, जिसमें साध्वियों के यौन शोषण का जिक्र था। 2021 में विशेष अदालत ने राम रहीम और अन्य को इस मामले में दोषी ठहराया था।
मगर मई 2024 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने राम रहीम और अन्य आरोपियों को इस मामले में बरी कर दिया। अदालत ने साक्ष्यों और गवाहियों में कमियां मानीं। इसके बाद राम रहीम के खिलाफ हत्या के दोनों प्रमुख मामलों में उच्च न्यायालय से राहत मिल चुकी है, लेकिन साध्वी यौन शोषण मामले में उसकी 20 साल की सजा जारी है।
अभी कौन से आरोप और मामले बाकी हैं
राम रहीम के खिलाफ केवल वही मामले चर्चा में नहीं रहे जिनमें सजा या बरी होने का फैसला आया। उसके खिलाफ जबरन नसबंदी/नपुंसक बनाने से जुड़ा एक गंभीर मामला भी लंबित बताया जाता है। आरोप है कि डेरे में कई अनुयायियों को आध्यात्मिक कारणों के नाम पर शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाया गया। इस मामले में सुनवाई चल रही है और हाल में एक गवाह की गवाही को लेकर अदालत में प्रक्रिया संबंधी आदेश भी सामने आया।
इसके अलावा 2015 के धार्मिक ग्रंथ बेअदबी मामलों में भी डेरा प्रमुख का नाम विवादों में रहा है। रिपोर्टों के अनुसार इन मामलों की सुनवाई उच्चतम न्यायालय में लंबित याचिका और जांच से जुड़े विवादों के कारण अटकी हुई है।
बार-बार पैरोल क्यों मिलती है
सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतना चर्चित दोषी बार-बार जेल से बाहर कैसे आ जाता है। कानूनी रूप से पैरोल या फर्लो कैदी का स्वतः अधिकार नहीं, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी नियमों के तहत दी जाने वाली अस्थायी राहत है। इसमें परिवार, स्वास्थ्य, अच्छे आचरण, सामाजिक कारण या अन्य परिस्थितियों को आधार बनाया जा सकता है।
राम रहीम के मामले में विवाद इसलिए बड़ा है क्योंकि उसे पिछले वर्षों में लगातार कई बार अस्थायी रिहाई मिली है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि 2020 से 2025 के बीच उसे कई मौकों पर पैरोल या फर्लो मिल चुकी थी और 2025 तक उसने लंबे समय जेल से बाहर बिताया।
आलोचकों का आरोप है कि डेरा का वोट-बैंक कई राज्यों में प्रभाव रखता है, इसलिए चुनावों के आसपास राम रहीम की रिहाई राजनीतिक शक पैदा करती है। कई बार उसकी पैरोल हरियाणा, दिल्ली या आसपास की चुनावी हलचलों के समय चर्चा में आई। हालांकि सरकारें आम तौर पर इसे जेल नियमों और प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला बताती रही हैं।
2024 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने कहा था कि राम रहीम की अस्थायी रिहाई संबंधी अर्जी पर फैसला पक्षपात या मनमानी के बिना होना चाहिए। 2025 में उच्चतम न्यायालय ने उसकी बार-बार रिहाई को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका खारिज कर दी थी।
सवाल कानून से आगे का भी है
कानून कहता है कि हर दोषी के पास कुछ सीमित अधिकार रहते हैं। जेल की सजा का अर्थ यह नहीं कि हर मानवीय या कानूनी सुविधा समाप्त हो जाए। लेकिन जब कोई व्यक्ति यौन शोषण जैसे गंभीर अपराध में दोषी हो, जब उसके नाम से हिंसा भड़की हो, जब उससे जुड़े मामलों ने पत्रकारिता, धर्म और राजनीति को झकझोरा हो, तब जनता यह पूछती है कि क्या नियम सभी कैदियों पर बराबर लागू होते हैं?
यह सवाल राम रहीम से बड़ा है। यह जेल व्यवस्था, राजनीतिक प्रभाव, धार्मिक संगठनों की ताकत और पीड़ितों के न्याय-बोध से जुड़ा सवाल है। एक साधारण कैदी को पैरोल के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ती है और एक प्रभावशाली व्यक्ति बार-बार बाहर कैसे आ जाता है—यही तुलना जनता के मन में बेचैनी पैदा करती है।
निष्कर्ष
राम रहीम की ताजा पैरोल 30 दिन की है, लेकिन उसका प्रभाव 30 दिन से कहीं बड़ा है। वह एक बार फिर जेल से बाहर है, मगर उसके पीछे अदालतों, पीड़िताओं, पत्रकारों, गवाहों और समर्थकों से भरी पूरी कहानी चलती है। साध्वी यौन शोषण मामले में वह दोषी है और 20 साल की सजा काट रहा है। पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और रणजीत सिंह हत्या मामलों में उसे उच्च न्यायालय से राहत मिल चुकी है। कुछ मामले अब भी लंबित हैं।
राम रहीम की कहानी भारत के समाज को आईना दिखाती है: जहां धर्म सत्ता बनता है, सत्ता प्रभाव बनती है और प्रभाव कई बार न्याय की राह को धुंधला कर देता है। पैरोल कानूनी प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन बार-बार पैरोल पर उठता सवाल नैतिक है—क्या न्याय केवल अदालत की फाइल में पूरा होता है, या पीड़ितों की स्मृति में भी उसका हिसाब बाकी रहता है?
अस्वीकरण: यह लेख ऑनलाइन उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं, समाचार रिपोर्टों, अदालती आदेशों और विश्वसनीय मीडिया स्रोतों के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को घटनाक्रम की पृष्ठभूमि और संदर्भ समझाना है। किसी भी लंबित मामले में अंतिम सत्य वही माना जाएगा जो संबंधित अदालत या सक्षम प्राधिकरण द्वारा आधिकारिक रूप से दर्ज किया जाएगा।