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अमिताभ–अक्षय तब देशहित में बोल रहे थे, अब क्यों चुप हैं? महंगे पेट्रोल पर पुराने ट्वीट फिर हुए वायरल

लेखक: Stalin • May 25, 2026 • 8 मिनट पढ़ें
अमिताभ–अक्षय तब देशहित में बोल रहे थे, अब क्यों चुप हैं? महंगे पेट्रोल पर पुराने ट्वीट फिर हुए वायरल
A symbolic news feature image showing blurred old social media reactions, public silence gestures, and a smiling political portrait to reflect the debate around fuel price hikes and selective outrage.
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महंगाई वही रही, बोलने वालों की रीढ़ बदल गई

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल पंप पर लगी मशीन का आंकड़ा नहीं होतीं। यह आंकड़ा रसोई तक जाता है, खेत तक जाता है, मंडी तक जाता है, बस-ऑटो के किराए तक जाता है और अंत में आम आदमी की थाली तक पहुंचता है। इसलिए जब ईंधन महंगा होता है, तो देश का गरीब, मध्यम वर्ग, किसान, मजदूर, छोटा दुकानदार और नौकरीपेशा आदमी एक साथ घायल होता है।

लेकिन भारत की राजनीति में ईंधन मूल्य वृद्धि का सबसे बड़ा तमाशा कीमतों से भी बड़ा है—चुनिंदा गुस्सा। 2012 से 2014 के बीच जब कांग्रेस-नीत संप्रग सरकार थी, तब कई नेता, अभिनेता और सार्वजनिक चेहरे पेट्रोल-डीजल महंगाई पर धारदार ट्वीट कर रहे थे। किसी को साइकिल याद आ रही थी, कोई कार जलाने वाला मजाक कर रहा था, कोई इसे सरकार की विफलता बता रहा था। बाद में जब सत्ता बदली और पेट्रोल कई जगह ₹100 प्रति लीटर के पार गया, तो वही स्वर या तो धीमे पड़े या बिल्कुल गायब हो गए। 2021 में पेट्रोल के ₹100 पार जाने पर पुराने ट्वीट फिर वायरल हुए थे और कई मीडिया संस्थानों ने उन पर रिपोर्ट की थी।

यह लेख किसी निजी जीवन पर हमला नहीं है। यह सार्वजनिक स्मृति की जांच है। सवाल सीधा है—क्या महंगाई का दर्द सरकार देखकर बदल जाता है?

1. नरेंद्र मोदी: “कांग्रेस-नीत संप्रग की विफलता” वाला पेट्रोल ट्वीट

2012 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उस समय पेट्रोल मूल्य वृद्धि पर उनका ट्वीट बहुत तीखा था। उन्होंने भारी पेट्रोल वृद्धि को कांग्रेस-नीत संप्रग की विफलता का उदाहरण बताया और कहा कि इससे गुजरात पर भारी बोझ पड़ेगा। उनका मूल ट्वीट आज भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है।

इस ट्वीट का अर्थ साफ था—महंगा पेट्रोल केवल आर्थिक घटना नहीं, शासन की नाकामी है। लेकिन सत्ता में आने के बाद वही तर्क जटिल हो गया। अब अंतरराष्ट्रीय बाजार, युद्ध, आयात, कर और राजस्व की बातें सामने आती हैं। ये बातें अर्थशास्त्र में सही हो सकती हैं, लेकिन राजनीति में सवाल बचा रहता है: जो बात विपक्ष में “नाकामी” थी, वह सत्ता में “मजबूरी” कैसे बन गई?

2. अमिताभ बच्चन: कार पर पेट्रोल छिड़ककर जलाने वाला व्यंग्य

अमिताभ बच्चन ने 2012 में पेट्रोल महंगा होने पर एक व्यंग्यात्मक ट्वीट किया था। ट्वीट में पंप कर्मचारी और मुंबईकर के बीच संवाद के जरिए यह तंज था कि कार में पेट्रोल भरवाने के बजाय उसके ऊपर थोड़ा पेट्रोल छिड़क दो, जलाना है। यह ट्वीट पेट्रोल में ₹7.5 की बढ़ोतरी के संदर्भ में था।

यह मजाक उस दौर की जनता की बेचैनी को पकड़ता था। लेकिन जब बाद के वर्षों में पेट्रोल कई शहरों में ₹100 से ऊपर गया, तब वही व्यंग्यात्मक धार सार्वजनिक रूप से कम दिखाई दी। कलाकार बोलें या न बोलें, यह उनका अधिकार है; पर जब वे सत्ता बदलते ही सावधान हो जाते हैं, तो जनता यह पूछती है कि चुप्पी कला है या सुविधा?

3. अक्षय कुमार: “साइकिल साफ कर लो” वाली सलाह

अक्षय कुमार का फरवरी 2012 वाला ट्वीट सबसे अधिक चर्चित पुराने ट्वीटों में गिना जाता है। उसमें उन्होंने पेट्रोल महंगा होने की आशंका पर लोगों को साइकिल साफ कर सड़क पर उतरने जैसी सलाह दी थी। मुंबई मिरर की रिपोर्ट के अनुसार बाद में यह ट्वीट उनके खाते से हट गया था।

यह ट्वीट केवल मजाक नहीं था। इसमें उस दौर की महंगाई के प्रति सार्वजनिक असंतोष था। लेकिन बाद में जब तेल की कीमतें और ऊपर गईं, तब वही आवाज वैसी खुलकर नहीं आई। अगर साइकिल 2012 में समाधान थी, तो 2021 या 2026 में वह व्यंग्य क्यों नहीं लौटा?

4. अक्षय कुमार: मुंबई की पेट्रोल कतारों वाला ट्वीट

अक्षय कुमार का एक और पुराना ट्वीट भी रिपोर्टों में दर्ज है, जिसमें उन्होंने मुंबई में पेट्रोल कीमत बढ़ने से पहले पंपों पर लगी लंबी कतारों का जिक्र किया था। न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने पुराने ट्वीटों की सूची में इस ट्वीट को भी शामिल किया था।

इस ट्वीट की खास बात यह है कि यह सीधे आम जीवन की परेशानी को दिखाता था। पेट्रोल महंगा होने से पहले लोग पंप पर जमा हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि अगले दिन वही ईंधन और महंगा मिलेगा। यह डर आज भी वही है। फर्क केवल इतना है कि उस डर पर बोलने वाली प्रसिद्ध आवाजें अब कम सुनाई देती हैं।

5. स्मृति ईरानी: आम आदमी और तेल कंपनियों वाला हमला

स्मृति ईरानी ने विपक्ष में रहते हुए पेट्रोल मूल्य वृद्धि पर संप्रग सरकार को घेरा था। पुराने ट्वीटों की रिपोर्ट में उनके बयान का सार यह था कि पेट्रोल फिर महंगा हुआ और आम आदमी की सरकार खास तेल कंपनियों के लिए काम कर रही है।

इस बयान की राजनीतिक धार बहुत तेज थी। इसमें सरकार और तेल कंपनियों की नजदीकी पर सवाल था। आज वही सवाल और भी बड़ा है, क्योंकि ईंधन कीमतों में करों और तेल कंपनियों की भूमिका पर आम जनता पारदर्शिता चाहती है। अगर विपक्ष में यह मुद्दा आम आदमी का था, तो सत्ता में भी वही रहना चाहिए था।

6. सलमान खान: गोबर गैस वाला मजाक

सलमान खान का पुराना ट्वीट भी पेट्रोल महंगाई के संदर्भ में वायरल सूची में शामिल हुआ। उसमें पेट्रोल की चिंता के बजाय गोबर गैस बनाने जैसा व्यंग्यात्मक जवाब था।

यह ट्वीट उस समय हल्का मजाक लग सकता था, लेकिन उसका सामाजिक अर्थ बड़ा था। महंगाई इतनी असहज हो गई थी कि सितारे भी ईंधन के विकल्प पर चुटकुले लिख रहे थे। आज जब ईंधन महंगा होता है, तो वही चुटकुले कम क्यों हो जाते हैं? क्या देश ने ऊर्जा संकट हल कर लिया, या बोलने वालों ने सत्ता से दूरी न रखने का हुनर सीख लिया?

7. बाबा रामदेव: ₹30 पेट्रोल का सपना

बाबा रामदेव का पुराना दावा भी बार-बार सामने आता है कि काला धन वापस आए तो पेट्रोल ₹30 में मिल सकता है। यह दावा न्यू इंडियन एक्सप्रेस की पुराने ट्वीटों वाली सूची में दर्ज है।

यह बयान केवल आर्थिक दावा नहीं था, यह राजनीतिक उम्मीद बेचने वाला नारा था। आम आदमी को बताया गया कि व्यवस्था बदलेगी तो ईंधन सस्ता हो सकता है। लेकिन वास्तविकता यह रही कि पेट्रोल-डीजल महंगाई बार-बार जनता को दबाती रही। ऐसे में सवाल बनता है कि क्या उस दौर के बड़े-बड़े दावे केवल मंच की गर्मी थे?

8. अनूपम खेर: मोटरसाइकिल घर में शोपीस

अनूपम खेर ने महंगे पेट्रोल पर एक व्यंग्य किया था, जिसमें चालक साइकिल से आने की बात करता है और मोटरसाइकिल घर में शोपीस बन जाती है। यह ट्वीट भी पुराने ईंधन-विवाद पर रिपोर्टों में उद्धृत हुआ।

यह व्यंग्य इसलिए असरदार था क्योंकि यह आम आदमी के वाहन को बेकार होने की स्थिति तक ले जाता था। महंगा पेट्रोल सिर्फ अमीर की कार का मुद्दा नहीं है। यह छोटे कर्मचारी की मोटरसाइकिल, किसान के पंप, दुकानदार की ढुलाई और छात्र के रोज के सफर का मामला है। इसलिए इस मुद्दे पर चुप्पी और भी भारी लगती है।

9. संबित पात्रा: गैस, डीजल और पेट्रोल वाला राजनीतिक तंज

संबित पात्रा ने संप्रग काल में आर्थिक शब्दों पर तंज करते हुए गैस, डीजल और पेट्रोल को लेकर व्यंग्य किया था। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की सूची में उनका पुराना ट्वीट भी शामिल है।

यह ट्वीट उस दौर की विपक्षी राजनीति की शैली दिखाता है। आर्थिक संकट को छोटे, तीखे और याद रहने वाले व्यंग्य में बदला गया। यही शैली जनता के गुस्से को आवाज देती थी। लेकिन सत्ता बदलने के बाद वही व्यंग्य सरकारी बचाव में बदल जाए, तो लोकतांत्रिक आलोचना कमजोर पड़ती है।

10. वसुंधरा राजे: तीसरी बार पेट्रोल वृद्धि और आम आदमी पर बोझ

वसुंधरा राजे ने पेट्रोल कीमतों में बार-बार वृद्धि को आम आदमी पर नया बोझ बताया था। रिपोर्टों के अनुसार उनका पुराना ट्वीट भी 2021 में पेट्रोल ₹100 पार जाने पर फिर वायरल हुए ट्वीटों की सूची में शामिल था।

यह बयान बिल्कुल सही राजनीतिक भाषा में था—ईंधन महंगाई आम आदमी पर बोझ है। समस्या यह है कि यह वाक्य हर सरकार में सच रहता है। अगर एक सरकार में पेट्रोल वृद्धि जनता पर बोझ है, तो दूसरी सरकार में भी वही बोझ है। जनता की जेब दल नहीं देखती, खर्च देखती है।

चुनिंदा चुप्पी का राजनीतिक अर्थ

इन पुराने ट्वीटों की सबसे बड़ी सीख यह है कि भारत में महंगाई पर गुस्सा अक्सर नैतिक नहीं, राजनीतिक होता है। जब सामने विरोधी सरकार हो, तो पेट्रोल का हर रुपया जनता की कराह बन जाता है। जब अपनी पसंद की सरकार हो, तो वही रुपया वैश्विक संकट, राष्ट्रहित, कर संरचना और मजबूरी में बदल जाता है।

यहां नेताओं और अभिनेताओं की निजी नीयत पर अंतिम फैसला सुनाना जरूरी नहीं। लेकिन सार्वजनिक भूमिका में उनकी जवाबदेही जरूर है। जिन लोगों ने 2012 में जनता की पीड़ा को शब्द दिए, उनसे जनता 2026 में भी वही ईमानदारी चाहती है। लोकतंत्र में याददाश्त भी प्रतिरोध का औजार है।

निष्कर्ष: तेल महंगा है, लेकिन सबसे महंगी है सार्वजनिक ईमानदारी

ईंधन मूल्य वृद्धि एक जटिल आर्थिक विषय है। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत, रुपये का मूल्य, आयात निर्भरता, केंद्र और राज्यों के कर, तेल कंपनियों की नीति और सरकार की राजस्व जरूरत—ये सभी कारक पेट्रोल-डीजल की कीमत तय करते हैं। लेकिन जनता की शिकायत इतनी जटिल नहीं है। उसका सवाल छोटा है: जब दर्द वही है, तो आवाज अलग क्यों है?

2012 में पेट्रोल महंगा था तो ट्वीटों में आग थी। बाद के वर्षों में पेट्रोल और महंगा हुआ तो कई जगह राख भी नहीं दिखी। यही विरोधाभास इस पूरी कहानी का केंद्र है। पेट्रोल की कीमतें सरकारें समझा सकती हैं; पर सत्ता देखकर बदलती आवाजों को जनता आसानी से माफ नहीं करती।

पुराने ट्वीट मिटाए जा सकते हैं। पुराने बयान भुलाए जा सकते हैं। लेकिन जनता की जेब और स्मृति दोनों का अपना हिसाब होता है। और इस हिसाब में सबसे बड़ा प्रश्न आज भी वही है—महंगाई पर गुस्सा सच था, या सिर्फ सत्ता-विरोध का अभिनय?

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