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गुजरात में नकली अदालत का सच: जब न्याय की कुर्सी पर बैठा एक बहुरूपिया, और करोड़ों की जमीन फैसलों के जाल में फँस गई?

लेखक: Stalin • May 21, 2026 • 7 मिनट पढ़ें
गुजरात में नकली अदालत का सच: जब न्याय की कुर्सी पर बैठा एक बहुरूपिया, और करोड़ों की जमीन फैसलों के जाल में फँस गई?
गांधीनगर में नकली अदालत चलाने के आरोपों ने दिखाया कि कैसे अदालत जैसे माहौल, फाइलों और झूठी कानूनी भाषा के सहारे लोगों के भरोसे से खिलवाड़ किया गया।
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गुजरात की राजधानी गांधीनगर में सामने आया यह मामला किसी अपराध कथा की पटकथा जैसा लगता है, लेकिन उपलब्ध अदालती आदेशों, पुलिस कार्रवाई और स्थानीय रिपोर्टों से साफ होता है कि इसके भीतर मजाक से कहीं अधिक गंभीर सच्चाई छिपी है। यह सिर्फ एक आदमी के “जज बनकर बैठ जाने” की कहानी नहीं है, बल्कि उस भरोसे की चोरी है जिस पर आम आदमी अदालत, वकील और कागज की मुहरों को पहचानता है।

सोशल मीडिया पर घूम रहे दावे में कहा जा रहा है कि मॉरिस सैमुअल क्रिश्चियन नाम के व्यक्ति ने 5 साल तक नकली अदालत चलाई, 100 से अधिक मामले निपटाए और करीब 30 करोड़ रुपये कमाए। जाँच में इतना स्पष्ट है कि मॉरिस सैमुअल क्रिश्चियन पर गांधीनगर में अदालत जैसा माहौल बनाकर अवैध मध्यस्थता कार्यवाही चलाने, खुद को अधिकृत मध्यस्थ बताने और जमीन से जुड़े विवादों में फर्जी आदेश पारित करने के गंभीर आरोप लगे। लेकिन “30 करोड़ रुपये की कमाई” और “हर मामले में 30 लाख रुपये” जैसी रकमों की स्वतंत्र पुष्टि विश्वसनीय खबरों या उपलब्ध अदालती रिपोर्टों में साफ तौर पर नहीं मिलती। इसलिए इन्हें अभी सोशल मीडिया का अपुष्ट दावा मानना चाहिए।

यह मामला तब खुला जब अहमदाबाद सिटी सिविल कोर्ट के रजिस्ट्रार हार्दिक सागर देसाई की शिकायत के आधार पर करणज पुलिस थाने में कार्रवाई शुरू हुई। पुलिस और अदालत से जुड़े विवरणों के अनुसार, क्रिश्चियन ने खुद को ऐसा व्यक्ति बताया जिसे जमीन विवादों में फैसला करने का अधिकार प्राप्त है, जबकि उसके पास ऐसा कोई वैध अधिकार नहीं था। अहमदाबाद की अदालत ने पाया कि उसने बिना वैधानिक नियुक्ति के खुद को मध्यस्थ-न्यायनिर्णायक की तरह पेश किया और ऐसे आदेश दिए जिन्हें बाद में अदालत में वास्तविक आदेश की तरह लागू कराने की कोशिश हुई।

इस कहानी का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा यह है कि यह कोई दूर-दराज की अँधेरी गली में चल रहा छल नहीं था। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, गांधीनगर के न्याय मंदिर परिसर में कमरा संख्या 109 से जुड़े संदर्भ सामने आए, जहाँ “समाधान कक्ष सह मध्यस्थता कक्ष” जैसा बोर्ड लगा था। इसी अदालतनुमा माहौल ने लोगों को भ्रमित किया। अदालत जैसा कमरा, कागजों की भाषा, वकीलनुमा लोग, फाइलें और फैसला सुनाने की मुद्रा—इन सबने मिलकर एक ऐसी नकली वैधता गढ़ी जिसमें आम आदमी आसानी से फँस सकता था।

मामले की जड़ जमीन विवादों में थी। ऐसे विवादों में लोग वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटते हैं, कागजों में उलझते हैं और अक्सर जल्दी राहत की तलाश में रहते हैं। यही जल्दबाजी ठगों के लिए रास्ता बनाती है। पुलिस के हवाले से आई रिपोर्टों में कहा गया कि क्रिश्चियन अपने पास आए लोगों को यह विश्वास दिलाता था कि उसे वैधानिक अधिकार मिला है और वह उनके विवाद का तेज समाधान करा सकता है। उसके सहयोगी कथित तौर पर अदालत के कर्मचारी या वकील बनकर खड़े होते थे, ताकि पूरी प्रक्रिया असली लगे।

सबसे अहम मामला अहमदाबाद के पालडी क्षेत्र की सरकारी जमीन से जुड़ा बताया गया। आरोप है कि वर्ष 2019 में क्रिश्चियन ने अपने एक ग्राहक के पक्ष में आदेश पारित किया, जिसमें राजस्व अभिलेखों में उस व्यक्ति का नाम जोड़ने जैसी बात सामने आई। पुलिस के अनुसार, उसने यह दावा किया कि वह सरकार या सक्षम अदालत द्वारा नियुक्त मध्यस्थ है, जबकि ऐसा कोई अधिकार उसके पास नहीं था। यही फर्जी आदेश बाद में वास्तविक अदालत में पेश हुआ और यहीं से शक गहराया।

अदालत ने ऐसे आदेश को शुरू से ही शून्य और लागू न होने योग्य माना। एक रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने पाया कि क्रिश्चियन ने खुद को बिना अधिकार के मध्यस्थ नियुक्त कर लिया और फर्जी आदेश पारित किया। एक जमीन मामले में तो अदालत ने यह भी देखा कि निजी दावेदारों के पक्ष में सरकारी या नगर निगम की जमीन पर दावा मजबूत करने की कोशिश की गई। रिपोर्टों के अनुसार, शाहवाडी क्षेत्र में अहमदाबाद नगर निगम के नाम से दर्ज 100 एकड़ से अधिक जमीन से जुड़ा फर्जी आदेश भी सामने आया, जिसके बाद तीसरी प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश हुआ।

यहाँ सोशल मीडिया के दावे और पुष्ट तथ्यों में फर्क समझना जरूरी है। दावा है कि 100 से अधिक मामले निपटाए गए और 30 करोड़ रुपये कमाए गए। विश्वसनीय रिपोर्टें यह जरूर बताती हैं कि उसने अनेक मामलों में फर्जी आदेश दिए और कुछ रिपोर्टों में 100 से अधिक फैसलों या 100 एकड़ से अधिक भूमि का संदर्भ आता है, लेकिन कुल कमाई 30 करोड़ रुपये थी—इसकी ठोस पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं दिखती। इसलिए खबर लिखते समय “करीब 30 करोड़ की ठगी” कहना अभी जल्दबाजी होगी। सही भाषा यह होगी कि “करोड़ों की जमीन और धन से जुड़े फर्जी आदेशों का आरोप है।”

इस पूरे प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है—क्रिश्चियन की पहचान को लेकर भी रिपोर्टों में अंतर है। कुछ रिपोर्टों में उसकी उम्र 37 वर्ष, कुछ में 46 वर्ष और कुछ में 40 के आसपास बताई गई। इसलिए “38 साल का आदमी” कहना भी पूर्णतः पुष्ट नहीं माना जा सकता। यह अंतर बताता है कि वायरल संदेशों को हूबहू खबर मान लेना खतरनाक है। जाँच-पड़ताल में नाम और आरोप पुष्ट दिखते हैं, लेकिन उम्र और कमाई जैसी बातें अलग-अलग स्रोतों में बदलती दिखाई देती हैं।

मामले में अहमदाबाद सिटी सिविल कोर्ट ने केवल पुलिस कार्रवाई तक बात सीमित नहीं रखी। फरवरी 2025 में अदालत ने एक अन्य मामले में भी रजिस्ट्रार को प्राथमिकी दर्ज कराने का आदेश दिया। आरोप था कि अहमदाबाद नगर निगम की जमीन से जुड़ा फर्जी आदेश तैयार कर उसे वास्तविक अदालत में लागू कराने की कोशिश हुई। अदालत ने याचिकाकर्ता विन्सेंट ओलिवर कारपेंटर पर 50 हजार रुपये का खर्च भी लगाया और कहा गया कि ऐसे फर्जी आदेश को लागू नहीं किया जा सकता।

इस प्रकरण में भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं का उल्लेख रिपोर्टों में सामने आया—लोक सेवक का रूप धारण करना, धोखाधड़ी, जालसाजी, मूल्यवान दस्तावेज की जालसाजी, फर्जी दस्तावेज को असली की तरह इस्तेमाल करना और आपराधिक साजिश जैसे आरोप। इसका अर्थ है कि यह केवल “नकली कुर्सी पर बैठने” का मामला नहीं, बल्कि दस्तावेजों और संस्थागत भरोसे के दुरुपयोग का मामला है।

एक दिलचस्प और गंभीर पहलू यह भी है कि क्रिश्चियन का नाम पहले भी विवादों में आया था। मार्च 2026 में आई रिपोर्टों के अनुसार, अहमदाबाद की अदालत ने उसे वर्ष 2011 के एक मामले में बरी कर दिया, जिसमें उस पर बिना वैध लाइसेंस के वकील बनकर पेश होने का आरोप था। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित नहीं कर सका। इसका अर्थ यह नहीं कि वर्तमान आरोप गलत हैं, बल्कि यह बताता है कि क्रिश्चियन का नाम कानूनी पहचान और अधिकार से जुड़े विवादों में पहले भी सामने आ चुका था।

सवाल यह है कि आम लोग कैसे फँसे? इसका जवाब भारत की न्याय व्यवस्था की धीमी चाल और जमीन विवादों की बेचैनी में छिपा है। जमीन का मामला अक्सर परिवार, आजीविका और भविष्य से जुड़ा होता है। जब कोई व्यक्ति अदालत जैसा कमरा बनाकर, कानूनी भाषा बोलकर और जल्दी फैसला देने का भरोसा देकर सामने आता है, तो पीड़ित पक्ष को लगता है कि शायद उसे वर्षों की भागदौड़ से मुक्ति मिल जाएगी। ठग इसी उम्मीद को चारा बनाता है।

यह घटना हमें यह भी सिखाती है कि अदालत केवल कुर्सी, बोर्ड, फाइल और काले कोट का नाम नहीं है। अदालत वैधानिक अधिकार, नियुक्ति, प्रक्रिया और न्यायिक निगरानी से बनती है। कोई भी व्यक्ति खुद को “जज” या “मध्यस्थ” बताकर फैसला सुनाने लगे, तो पहला सवाल यही होना चाहिए कि उसे यह अधिकार किसने दिया? क्या संबंधित अदालत का नियुक्ति आदेश है? क्या पक्षों के बीच वैध मध्यस्थता समझौता है? क्या कार्यवाही किसी मान्य कानून के तहत हो रही है?

गुजरात में यह अकेली घटना नहीं, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में फर्जी सरकारी दफ्तर, नकली टोल नाका और नकली अधिकारी जैसे मामलों के साथ एक व्यापक पैटर्न की तरह देखी जा रही है। रिपोर्टों में गुजरात के ऐसे कई मामलों को जोड़कर देखा गया है, जहाँ नकली संस्थाएँ असली व्यवस्था की शक्ल पहनकर काम करती रहीं। यह पैटर्न सिर्फ अपराध नहीं, प्रशासनिक सतर्कता पर भी सवाल है।

सच्चाई यह है कि मॉरिस सैमुअल क्रिश्चियन पर लगे आरोप बेहद गंभीर हैं और अदालतों ने फर्जी आदेशों को लेकर कठोर टिप्पणियाँ की हैं। लेकिन वायरल कहानी में जो मसाला जोड़ा गया है जैसे हर मामले में 30 लाख रुपये, कुल 30 करोड़ रुपये की कमाई, या ठीक 38 साल की उम्र—इनकी पुष्टि सावधानी से करनी होगी। पत्रकारिता का काम सनसनी को सजाना नहीं, सत्य को छानना है।

इस मामले का असली सबक यह है कि जब व्यवस्था धीमी होती है, तो धोखा तेज हो जाता है। जब न्याय दूर लगता है, तो नकली न्याय पास आकर बैठ जाता है। गांधीनगर की यह नकली अदालत केवल एक व्यक्ति का छल नहीं थी; यह उस समाज का आईना भी थी जहाँ लोग न्याय पाने के लिए इतने बेचैन हैं कि न्याय की नकल को भी न्याय समझ बैठते हैं। असली अदालत ने आखिरकार इस नकली दरबार का पर्दा गिरा दिया, लेकिन सवाल अभी भी खड़ा है क्या अगला बहुरूपिया किसी और बोर्ड, किसी और मुहर और किसी और कमरे में फिर से बैठा नहीं होगा?

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