लेखक: GlobalTimesHindi.com के लिए

संसद का यह सत्र राजनीतिक घमासान और विचारधाराओं के टकराव का गवाह बना। एक ओर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जनता के मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाया, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार की उपलब्धियों का बखान करते हुए विपक्ष पर तीखे हमले किए। दोनों नेताओं ने अपनी बातों को ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से मजबूती देने की कोशिश की। हालांकि, अगर दोनों के भाषणों का तुलनात्मक विश्लेषण किया जाए, तो राहुल गांधी ने इस बार भावनात्मक अपील और तथ्यात्मक हमलों से एक धारदार बढ़त बनाई।


🟦 राहुल गांधी का भाषण: ‘भारत एक भावना है’

राहुल गांधी ने अपने भाषण की शुरुआत देश की आत्मा, संस्कृति और विविधता की बात करते हुए की। उन्होंने आदिवासियों, दलितों, मुसलमानों और किसानों का उल्लेख कर संसद के मंच से सीधे जनता की आवाज़ उठाई।

🗣 राहुल गांधी ने कहा:

“भारत एक भूगोल नहीं है, भारत एक भावना है। भारत में सभी धर्मों, जातियों और भाषाओं को बराबरी का अधिकार है। लेकिन सरकार इस भावना को कुचल रही है।”

उनकी भाव-प्रधान शैली, शिव और सनातन पर किए गए उद्धरणों ने न केवल संसद को, बल्कि आम जनमानस को भी झकझोरा। उन्होंने प्रधानमंत्री से सीधे सवाल पूछे—अडानी, रोजगार, मणिपुर हिंसा और संस्थानों की निष्पक्षता पर।

राहुल ने कहा:

“यह सरकार भगवान का नाम लेकर नफरत फैला रही है, जबकि भगवान सभी में है—मुसलमानों में, सिखों में, महिलाओं में और गरीबों में।”
यह उद्धरण संसद में इतिहास बन गया, और विपक्षी खेमे में जोरदार तालियों से स्वागत हुआ।


🟧 नरेंद्र मोदी का भाषण: ‘देश आत्मनिर्भर बन रहा है’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लंबे भाषण में विकास, राष्ट्रवाद और विपक्ष की ‘नकारात्मक राजनीति’ पर केंद्रित बातें कीं। उन्होंने 10 सालों की अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाया—अंतरिक्ष से लेकर सड़क तक, अर्थव्यवस्था से लेकर डिजिटल इंडिया तक।

🗣 नरेंद्र मोदी ने कहा:

“देश आज आत्मनिर्भर भारत की ओर अग्रसर है। विपक्ष के पास ना मुद्दे हैं, ना नीति है, ना नीयत। जनता सब देख रही है।”

मोदी ने राहुल गांधी का नाम लिए बिना उन्हें ‘कागजी नेता’ कहा, और कांग्रेस के शासन को ‘भ्रष्टाचार और परिवारवाद’ से जोड़ा।

उनकी बातों में आत्मविश्वास जरूर था, लेकिन उन्होंने कई संवेदनशील मुद्दों पर या तो चुप्पी साधी या उन्हें विपक्ष की साजिश बताकर टालने की कोशिश की।


📊 कौन रहा प्रभावशाली?

प्रधानमंत्री मोदी की वक्तृत्व शैली हमेशा से प्रभावशाली रही है। वे बड़े विज़न और राष्ट्रवाद की भाषा बोलते हैं। लेकिन इस बार राहुल गांधी ने एक अलग अंदाज़ में देश की ‘आत्मिक पीड़ा’ को संसद में रखकर एक नई पहचान बनाई।

उनके भाषण में न केवल जनता से जुड़ी चिंताएँ थीं, बल्कि एक नैतिक और सांस्कृतिक विमर्श भी था, जिसने लोगों को सोचने पर मजबूर किया।

जहां मोदी ने ‘विकास’ की बात की, वहीं राहुल ने ‘विचार’ और ‘वास्तविकता’ को संसद में उतारा।


📌 निष्कर्ष:

राहुल गांधी ने इस बार संसद में एक परिपक्व नेता के रूप में अपनी छवि गढ़ने की कोशिश की और उसमें काफी हद तक सफल भी रहे। उनके भाषण में भावना और तथ्य दोनों का मेल था, जबकि मोदी जी का भाषण एक बेहतरीन नेतृत्वकर्ता का भाषण तो था, लेकिन उसमें जनता की तकलीफों की प्रतिध्वनि उतनी नहीं थी।

👉 थोड़ा सा झुकाव दिखे, तो राहुल गांधी को इस बार एक हल्की बढ़त मिली — खासकर विपक्ष और सामाजिक तबकों की नज़र से।xx