31 जुलाई 2025, नई दिल्ली —
17 वर्षों बाद उस दहशत के पर्दाफाश का अंत हुआ, लेकिन सवालों की आग अब भी बुझी नहीं। Special NIA Court, मुंबई ने आज सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया, जिनमें श्रीमान् साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित भी शामिल थे।
अभियुक्तों की संपूर्ण सूची:
-
साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर – पूर्व सांसद व आध्यात्मिक-संगठक
-
लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित – पूर्व रक्षा अधिकारी
-
मेजर (सेवानिवृत्त) रमेश उपाध्याय
-
अजय रहिरकर
-
सुधाकर द्विवेदी
-
सुधाकर चतुर्वेदी
-
समीर कुलकर्णी
इनपर लगाए गए आरोप — UAPA, Arms Act, IPC की धाराएं 120(b), 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 324 (हानि पहुँचा), 153A (धार्मिक विभाजन भड़काने)—सहित अनेक गंभीर आपराधिक आरोप थे।
न्यायालय ने क्या पाया?
न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि दहशतनाक घटना यथार्थ थी, पर आरोप सिद्ध करने के लिए आवश्यक “दृढ़ व विश्वसनीय प्रमाण” नहीं मिले।
मुख्य अभियोजन का नायक साबित करने वाला मामला अब सबूतों की आड़ में धुंधला हो गया। सभी दोषियों को ‘संशय का लाभ’ देकर बरी किया गया।
अभियुक्तों की प्रतिक्रियाएँ:
-
साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने कहा:
“यह मेरी नहीं, ‘भगवा विजय’ की जीत है। बदनाम करने वालों की कलम अब टूट चुकी है।” -
लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित ने कहा:
“इंतज़ार का फल मिला। मेरे न्याय पर विश्वास अचूक रहा।”
राजनीतिक एवं सामाजिक विवेचना:
-
AIMIM नेता Asaduddin Owaisi ने लिखा:
“Malegaon धमाके में छह मुसलमानों को निशाना बनाया गया था, अब दोषियों को दोषमुक्त देख न्याय व्यवस्था पर भरोसा टूट रहा है।” -
Digvijay Singh (Congress) ने कहा:
“धर्म किसी हिंसा की पुष्टि नहीं करता। सबूतों की कमी से न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा है।” -
BJP नेता Sudhir Mungantiwar ने कहा:
“यह ‘Saffron Terror’ की राजनीति का झूठ था। सरकार को अब सार्वजनिक रूप से माफी माँगनी चाहिए।”
न्यायिक प्रक्रिया की खामियाँ:
-
कानूनी दोष – UAPA पॉवर के दुरुपयोग और अनुमोदन आदेशों की संवैधानिक समस्याएं
-
जांच का वैधारंभ – ATS की शुरुआती रिपोर्टों में विसंगतियाँ
-
गवाहों की विश्वसनीयता – भारी साक्ष्य टूटने की नौबत तक नहीं पहुँचे
-
राजनीतिक दबाव – अभियुक्तों की सामाजिक चिन्हता से राजनीति प्रभावित हुई
आगे क्या हो सकता है?
-
Maharashtra सरकार उच्च न्यायालय में अपील कर सकती है
-
रासुका संधान की समीक्षा की मांग उठ सकती है
-
NIA की प्रक्रिया की पारदर्शिता पर पुनर्विचार ज़रूरी हो सकता है
निष्कर्ष:
Malegaon ब्लास्ट अब बस एक दृष्टांत बन चुका है—जहाँ कोर्ट ने निष्पक्षता दिखाई, लेकिन न्याय का इंजीनियरिंग मॉडल विफल साबित हुआ।
क्या धमाका एक ऐसा तथ्य था, जिसकी परिकल्पना तक गलत थी?
या हमारे न्यायिक तंत्र ने सच्चाई से दूरी बेहतर समझी?
दो दशकों की पीड़ा, मुकदमों का लंबा सिलसिला… और आज ये सवाल बाकी हैं:
हमारे माध्यम से सच्चाई गुम हो गई या न्याय की राह रोजमर्रा की गलतियों में दब गई?
